सम्पादकीय की कलम से…….
दशहरा: बुराई पर अच्छाई की विजय का महापर्व
दशहरा केवल रावण दहन का पर्व नहीं है: यह हर व्यक्ति और समाज के भीतर सोए हुए अहंकार, अन्याय, भ्रष्टाचार और संकीर्णता को पहचानकर उसे हराने का संकल्प है। राम की जीत, रावण का पतन
रामायण की कथा में राम केवल एक राजकुमार नहीं, बल्कि मर्यादा, धैर्य, न्याय और कर्तव्य के प्रतीक हैं। रावण विद्वान और शक्तिशाली था, पर उसका अहंकार, लोभ और दूसरों के अधिकारों का अपमान उसे पतन की ओर ले गया। दशहरा हमें यही बताता है कि शक्ति उतनी खतरनाक नहीं होती, जितनी उसका दुरुपयोग।
आज के समय में रावण केवल दस सिरों वाला कोई पौराणिक चरित्र नहीं है। वह हमारे भीतर और समाज में कई रूपों में मौजूद है सत्ता का घमंड, भ्रष्ट व्यवस्था, नारी के प्रति असुरक्षा, सांप्रदायिक वैमनस्य, झूठी सूचनाओं का प्रसार, और जरूरतमंदों की उपेक्षा। इन सबका दहन ही असली विजयादशमी है।
अनियंत्रित पर्यावरण भी आज का सबसे बड़ा रावण है। दिल्ली जैसे शहरों में अक्टूबर के अंत में वायु गुणवत्ता अक्सर बिगड़ने लगती है, इसलिए पटाखों और खुले में जलाने से प्रदूषण बढ़ने की चिंता गंभीर है। अदालत भी दशहरा और दीपावली के दौरान पटाखों पर संतुलित नियमों तथा पर्यावरण अनुकूल विकल्पों पर विचार कर रही है।
इसलिए रावण दहन का अर्थ केवल बड़ी प्रतिमा जलाना नहीं होना चाहिए। प्रदूषण, कूड़ा, नदियों का दूषण, पेड़ों की कटाई और जलवायु परिवर्तन भी आज के रावण हैं। दिल्ली की एक रामलीला समिति इस बार रावण के साथ ‘कॉकरोच’ की प्रतिमा जलाकर गंदगी और अस्वच्छता के उन्मूलन का संदेश दे रही है, जो पर्व को सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ने का प्रयास है।
रामलीला समितियों ने पहले भी पटाखों की जगह लेजर, ध्वनि और एलईडी प्रभावों का उपयोग किया है। यही आदर्श है परंपरा को बनाए रखें, पर पर्यावरण को नुकसान न पहुँचाएं।
सामाजिक बुराइयों का दहन
दशहरा हमें यह भी पूछने पर मजबूर करता है कि क्या हम केवल बाहरी रावण जलाते हैं या अपने भीतर की कमियों पर भी विचार करते हैं? घर में महिलाओं के प्रति भेदभाव, बच्चों की शिक्षा की उपेक्षा, नौकरियों में सिफारिश, सार्वजनिक संपत्ति की क्षति, और सोशल मीडिया पर नफरत फैलाना ये सब आधुनिक रावण के अंग हैं।
एक सच्चा नागरिक वही है, जो अपने वोट का सही उपयोग करे, कानून का सम्मान करे, सफाई बनाए रखे, सत्य की रक्षा करे और कमजोर के पक्ष में खड़ा हो। राम राज्य का अर्थ केवल धार्मिक शासन नहीं, बल्कि न्याय, सुरक्षा, समानता और जनता की चिंता करने वाली व्यवस्था है।
श्री मद्भागवत गीता में उल्लेख है कि सबसे बड़ी विजय अपने मन पर विजय है। दशहरा इसी आत्मविजय का पर्व है। जब हम क्रोध पर नियंत्रण रखते हैं, झूठ से दूर रहते हैं, दूसरों की पीड़ा समझते हैं और अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटते, तब भीतर का रावण जलता है।
आज की परिस्थितियों में दशहरा हमें यह सिखाता है कि विजय केवल त्योहार के दिन नहीं, रोज के व्यवहार में होनी चाहिए। प्रदूषणमुक्त उत्सव, स्वच्छ पड़ोस, सच्ची सूचना, संवेदनशील व्यवहार और ईमानदार कर्तव्य यही आधुनिक युग का रावण दहन है।
यही संदेश दशहरा को केवल धार्मिक आयोजन से ऊपर उठाकर एक राष्ट्रीय और नैतिक संकल्प बनाता है, बुराई का अंत, सत्य की जीत और जिम्मेदार नागरिक का उदय। संवेदना पथिक के सभी सम्माननीय परिवार जनों और देशवासियों को विजयादशमी पर हार्दिक शुभकामनाएं।
दशहरा हमें संकल्प लेने का अवसर देता है कि हम अपने जीवन में सत्य, करुणा, न्याय और सद्भाव को प्राथमिकता देंगे। आइए, इस विजयादशमी पर केवल रावण के पुतले का दहन न करें, बल्कि अपने विचारों और व्यवहार में छिपी बुराइयों को मिटाकर एक ऐसे समाज के निर्माण में योगदान दें, जहां हर व्यक्ति सुरक्षित हो, प्रकृति संरक्षित हो और हर किसी को सम्मान के साथ जीने का अवसर मिले। जब अच्छाई हमारे विचारों में, ईमानदारी हमारे कर्मों में और संवेदना हमारे व्यवहार में उतर आएगी, तभी दशहरे का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा।
– श्रीमती किरण