पर्यावरण

मानसून का बदला मिजाज: कहीं बाढ़ जैसे हालात, कहीं बारिश का इंतजार

इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून का व्यवहार मौसम विशेषज्ञों और किसानों दोनों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। देश के विभिन्न हिस्सों में बारिश का वितरण असामान्य दिखाई दे रहा है। जिन क्षेत्रों में सामान्यतः जून के दौरान कम वर्षा होती है, वहां इस बार औसत से अधिक बारिश दर्ज की गई है। दूसरी ओर, ऐसे इलाके जहां मानसून आमतौर पर जोरदार दस्तक देता है, वहां अब तक पर्याप्त वर्षा नहीं हुई है।

राजस्थान जैसे शुष्क और रेगिस्तानी राज्य में जून महीने में अपेक्षा से अधिक बारिश देखने को मिली है। इसके विपरीत महाराष्ट्र के कई हिस्सों, विशेषकर मुंबई क्षेत्र में, मानसून की रफ्तार अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रही। इस असमान वर्षा ने मौसम के बदलते स्वरूप को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि इस स्थिति के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें हिंद महासागर क्षेत्र में सक्रिय मौसमीय प्रणालियां, सोमाली जेट की स्थिति और प्रशांत महासागर से जुड़े जलवायु प्रभाव शामिल हैं। कुछ विशेषज्ञ अल-नीनो जैसे वैश्विक मौसमीय कारकों की भूमिका की भी जांच कर रहे हैं, हालांकि इसके प्रभाव को लेकर अभी विस्तृत अध्ययन जारी है।

आंकड़ों के अनुसार, जून महीने में अब तक देश में औसतन लगभग 46 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई है, जबकि सामान्य परिस्थितियों में इस अवधि तक करीब 84.4 मिलीमीटर बारिश होती रही है। इस प्रकार वर्षा में लगभग 46 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है, जो कृषि और जल संसाधनों के लिए चिंता का संकेत माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में मानसून की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जाएगी। यदि वर्षा का यह असंतुलन लंबे समय तक बना रहता है, तो इसका असर खेती, जल भंडारण और सामान्य जनजीवन पर पड़ सकता है।

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